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Friday, 10 Jul 2026

Rajbhasha Prakoshth

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राजभाषा

राजभाषा संकल्प, 1968

परिचय

भारत के संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी है तथा अनुच्छेद 351 के अनुसार हिंदी भाषा का प्रसार, विकास और संवर्धन करना संघ का कर्तव्य है, ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का प्रभावी माध्यम बन सके।

इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु संसद के दोनों सदनों द्वारा राजभाषा संकल्प, 1968 पारित किया गया। इस संकल्प में हिंदी के प्रसार एवं विकास की गति बढ़ाने, संघ के राजकीय प्रयोजनों में हिंदी के उत्तरोत्तर प्रयोग, संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित भारतीय भाषाओं के समन्वित विकास, त्रिभाषा सूत्र के प्रभावी कार्यान्वयन तथा संघ सेवाओं में भाषा संबंधी प्रावधानों के संबंध में महत्वपूर्ण निर्णय निहित हैं।

राजभाषा संकल्प, 1968 – प्रमुख बिंदु

1. हिंदी का प्रसार और प्रगतिशील प्रयोग

संघ के विभिन्न राजकीय प्रयोजनों में हिंदी के क्रमिक और प्रभावी प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार द्वारा एक अधिक गहन एवं व्यापक कार्यक्रम तैयार किया जाएगा और उसे कार्यान्वित किया जाएगा। किए जाने वाले उपायों तथा की गई प्रगति की विस्तृत वार्षिक मूल्यांकन रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखी जाएगी तथा सभी राज्य सरकारों को भेजी जाएगी।

2. भारतीय भाषाओं का समन्वित विकास

संविधान की आठवीं अनुसूची में हिंदी के अतिरिक्त भारत की 21 मुख्य भाषाओं का उल्लेख किया गया है। देश की शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक उन्नति के लिए यह आवश्यक है कि इन भाषाओं के पूर्ण विकास हेतु सामूहिक उपाय किए जाएँ। इसी उद्देश्य से हिंदी के साथ-साथ इन सभी भारतीय भाषाओं के समन्वित विकास के लिए भारत सरकार द्वारा राज्य सरकारों के सहयोग से कार्यक्रम तैयार किए जाने का प्रावधान किया गया, ताकि ये भाषाएँ शीघ्र समृद्ध हों और आधुनिक ज्ञान के संचार का प्रभावी माध्यम बन सकें।

3. त्रिभाषा सूत्र का कार्यान्वयन

राष्ट्रीय एकता की भावना के संवर्धन तथा देश के विभिन्न भागों में जनता के बीच संचार की सुविधा के लिए त्रिभाषा सूत्र को प्रभावी रूप से लागू किया जाना आवश्यक माना गया। इसके अंतर्गत हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी तथा अंग्रेज़ी के अतिरिक्त एक आधुनिक भारतीय भाषा, विशेष रूप से दक्षिण भारत की भाषाओं में से किसी एक को प्राथमिकता देते हुए, पढ़ाए जाने की व्यवस्था का प्रावधान किया गया। इसी प्रकार अहिंदी भाषी क्षेत्रों में प्रादेशिक भाषा और अंग्रेज़ी के साथ हिंदी के अध्ययन की व्यवस्था करने पर बल दिया गया।

4. संघ सेवाओं में भाषा संबंधी प्रावधान

संघ की लोक सेवाओं के संबंध में देश के विभिन्न भागों के लोगों के न्यायोचित दावों और हितों की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए यह प्रावधान किया गया कि उन विशेष सेवाओं अथवा पदों को छोड़कर, जिनके कर्तव्यों के संतोषजनक निर्वहन के लिए केवल हिंदी, केवल अंग्रेज़ी अथवा दोनों भाषाओं का उच्च स्तर का ज्ञान आवश्यक हो, संघ सेवाओं अथवा पदों पर भर्ती के समय उम्मीदवारों के लिए हिंदी अथवा अंग्रेज़ी में से किसी एक का ज्ञान अनिवार्य होगा। साथ ही, संघ लोक सेवा आयोग के विचार प्राप्त करने के पश्चात अखिल भारतीय एवं उच्चतर केंद्रीय सेवाओं की परीक्षाओं में संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित सभी भाषाओं तथा अंग्रेज़ी को वैकल्पिक माध्यम के रूप में अनुमति देने का भी प्रावधान किया गया।

उद्देश्य

  • संघ के राजकीय कार्यों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देना।
  • हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के संतुलित एवं समन्वित विकास को प्रोत्साहित करना।
  • प्रशासनिक, शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में भाषा के प्रभावी उपयोग को सुनिश्चित करना।
  • राजभाषा नीति के प्रावधानों के अनुपालन के माध्यम से राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना।